इतिहास से परिपूर्ण है झाड़खंडेश्वर मंदिर,भगवान शिव के 400 वर्ष से अधिक पुराने ऐतिहासिक किस्से जुड़े हुए

●इतिहास से परिपूर्ण है झाड़खंडेश्वर मंदिर
●भगवान शिव के 400 वर्ष से अधिक पुराने ऐतिहासिक किस्से जुड़े हुए

■नारायण सिंह रावत
■सितारगंज/शक्तिफार्म:- बाराकोली रेंज के जंगल में स्थित भगवान शिव का ऐतिहासिक झाड़खंडेश्वर मंदिर (झाड़ी मन्दिर) श्रद्घालुओं के आस्था व उपासना का केंद्र है। भगवान शिव के 400 वर्ष से अधिक पुराने इस पौराणिक मंदिर में कई धार्मिक व ऐतिहासिक किस्से जुड़े हुए हैं। बाबा आगमपुरी के वंशज चार पीढि़यों से इस मंदिर में पुजारी है। शिवरात्रि पर यहां तीन दिवसीय मेले का आयोजन भी किया जाता है।
मंदिर में दूसरी पीढ़ी में पुजारी बताते हैं कि उन्होंने अपने पूर्वजों से इस मंदिर के अस्तित्व में आने के कई किस्से सुने हैं। उनके अनुसार तब तराई के इस क्षेत्र में घना जंगल हुआ करता था। गांव में रहने वाला एक ग्वाला परिवार गायों को चराने जंगल लाते थे। तब एक गाय घने जंगल के झाडि़यों में गायब हो जाती थी और कुछ समय बाद वापस आ जाती थी। जिस दिन वह गाय गौशाला में होती थी। उस दिन भी नीयत समय पर गौशाला से चली जाती और समय से वापस गौशाला आ जाती थी। यह देख ग्वाला गाय को रस्सी व जंजीरों से गौशाला में बांध कर रखने लगा। बावजूद इसके गाय गौशाला से चली जाती थी। इतना ही नहीं गाय जब वापस आती तो उसके थन में दूध नहीं होता था। यह देख ग्वाले ने एक दिन गाय का पीछा किया, तो देखा गाय जंगल के बीच घनी झाडि़यों में जाकर रूक गई। गाय के जाने के बाद जब ग्वाले ने झाडि़यों में जाकर देखा तो वह हैरान रह गया। वहां एक शिवलिंग था, जिस पर गाय का दूध चढ़ा था। ग्वाले ने यह बात गांव में बताई तो यह दूर तक फैल गई। श्रद्घालु जंगल पहुंचकर शिवलिंग की पूजा अर्चना करने लगे। समय-बीतने के साथ लोगों ने वहां एक मंदिर की स्थापना कर दी। झाडि़यों में शिवलिंग प्रकट होने से भगवान शिव का यह मंदिर झाड़ी मंदिर के नाम से प्रसिद्घ हो गया। उदयपुरी बताते हैं कि उन दिनों इस समूचे क्षेत्र में सुल्ताना डाकू का आतंक था। सुल्ताना जब रात को काफिले के साथ लूटपाट करने निकलता था तो उसके आगे-आगे एक बाबा, लोगों को जगाते व सूचना देकर सतर्क करते जाते थे। अक्सर ऐसा होने पर एक बार सुल्ताना ने बाबा का पीछा किया तो देखा जंगल की घनी झाडि़यों में बाबा अदृश्य हो गए। नजदीक जाने पर वहां शिवलिंग दिखाई दिया। तब आक्रोश में सुल्ताना ने तलवार से शिवलिंग पर वार कर दिया। जिसके निशान आज भी शिवलिंग पर मौजूद बताए जाते हैं। ऐसी अन्य किस्से भी हैं।











