फैक्ट्री में काम कर रहे किशोर का हाथ मशीन में फंसा, गंभीर

■फैक्ट्री में काम कर रहे किशोर का हाथ मशीन में फंसा, गंभीर
■बाल श्रम के आरोप, स्वजन ने कंपनी प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया

■सितारगंज : औद्योगिक विकास के दावों के बीच सितारगंज से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने सिस्टम, कानून और इंसानियत—तीनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक निजी पैकेजिंग कंपनी में 16 वर्षीय किशोर से न केवल बाल श्रम कराया जा रहा था, बल्कि उसे बिना प्रशिक्षण और सुरक्षा इंतजाम के चलती मशीन पर काम करने के लिए लगा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि मशीन में फंसकर उसका हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। हैरानी की बात यह है कि हादसे के बाद भी कंपनी प्रबंधन की संवेदनहीनता जारी रही और एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद उसका समुचित इलाज नहीं कराया गया, जिससे अब अंगूठा काटने की नौबत आ गई है।
गांव बनकुइया, गोठा निवासी पूजा देवी ने बताया कि आर्थिक तंगी के चलते उनका 17 वर्षीय बेटा रोहित पिछले करीब ढाई महीने से सितारगंज बिज्टी चौराहे स्थित पैकेजिंग कंपनी में काम कर रहा था। कंपनी उससे प्रतिदिन 12 घंटे काम कराती थी और इसके एवज में उसे 12 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता था। परिवार की मजबूरी ऐसी थी कि कम उम्र में ही रोहित को पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करनी पड़ी। उसके पिता वीरेंद्र प्रकाश लंबे समय से बीमार हैं और टेंट की दुकान पर मजदूरी कर किसी तरह परिवार का गुजारा करते हैं। पूजा देवी के अनुसार 20 फरवरी को सुबह आठ बजे रोहित रोज की तरह काम पर गया था। वहां मौजूद एक सुपरवाइजर ने उसे उसके तय काम लोडिंग-अनलोडिंग से हटाकर मशीन पर लगा दिया। न तो उसे मशीन चलाने का अनुभव था और न ही कोई सुरक्षा उपकरण दिया गया। शाम करीब साढ़े सात बजे अचानक उसका हाथ चलती मशीन में फंस गया। दर्द से चीखते किशोर को देख अन्य श्रमिक दौड़े और मशीन बंद कर किसी तरह उसका हाथ बाहर निकाला। हादसे के बाद कंपनी प्रबंधन ने उसे आनन-फानन में एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया और बेहतर इलाज का आश्वासन दिया, लेकिन यह आश्वासन जल्द ही खोखला साबित हुआ। पीड़ित परिवार का आरोप है कि एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न तो इलाज में गंभीरता दिखाई गई और न ही पर्याप्त आर्थिक सहायता दी गई। डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया है कि इलाज में देरी के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ गया है और अब उसका अंगूठा काटना पड़ सकता है। घटना ने एक बार फिर औद्योगिक क्षेत्र में बाल श्रम और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की पोल खोल दी है। सवाल यह है कि आखिर एक नाबालिग को 12 घंटे तक काम पर लगाने की अनुमति किसने दी? और उससे भी बड़ा सवाल—उसे खतरनाक मशीन पर बिना प्रशिक्षण के क्यों लगाया गया? यह न सिर्फ बाल श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन है, बल्कि श्रमिक सुरक्षा नियमों की भी घोर अनदेखी है। मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सामाजिक संगठनों ने कंपनी प्रबंधन से पीड़ित को 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता, बेहतर इलाज की व्यवस्था, 10 हजार रुपये मासिक दिव्यांग पेंशन और कंपनी में कार्यरत अन्य श्रमिकों के लिए सुरक्षा किट उपलब्ध कराने की मांग उठाई है। वहीं, श्रम विभाग ने मामले की जांच शुरू करने की बात कही है। श्रम प्रवर्तन अधिकारी मीनाक्षी भट्ट का कहना है कि यदि जांच में बाल श्रम और लापरवाही की पुष्टि होती है तो कंपनी प्रबंधन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच और कार्रवाई के बीच झूलता यह मामला किसी ठोस नतीजे तक पहुंचेगा या फिर एक और गरीब परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकता रह जाएगा। जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, तब तक यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी की एक और कड़वी कहानी बनकर सामने खड़ी है।





