टीईटी की अनिवार्यता रोकने के लिए कानून बनाने की मांग

■टीईटी की अनिवार्यता रोकने के लिए कानून बनाने की मांग
■ लोगों ने तहसीलदार के माध्यम से प्रधानमंत्री को भेज ज्ञापन

■सितारगंज। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने 23 अगस्त 2010 को अधिसूचना जारी कर शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में टीईटी को अनिवार्य किया था,लेकिन हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 01 सितम्बर 2025 एवं 29 मई 2026 को पारित निर्णय के बाद 2010 से पूर्व विभिन्न राज्यों में तत्कालीन नियमों और पात्रता मानकों के आधार पर विधिवत नियुक्त हुए देश भर के लाखों वरिष्ठ शिक्षकों पर भी टीईटी की अनिवार्यता से शिक्षकों की सेवा,वरिष्ठता, पदोन्नति और अन्य सेवा लाभ असुरक्षित हो गये है।
बाद में लागू किए गये पात्रता मानदण्डों को पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू करना प्राकृतिक न्याय, समानता और विधिक निश्चिंतता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के उक्त निर्णय से शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी अनिवार्यता के नियमों के स्थाई समाधान हेतु विधायी हस्तक्षेप किया जाना आवश्यक हो गया है।साथ ही देश के समस्त शिक्षक कर्मचारियों को पुरानी पेंशन बहाली किया जाना नितांत आवश्यक है।
अतः देशभर के लाखों शिक्षक आपके कुशल एवं लोकप्रिय यशस्वी नेतृत्व से सादर निवेदन करते हैं कि बाद में लागू किए गए पात्रता नियमों (2010) से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को प्राकृतिक न्याय,समानता,विधिक निश्चिंतता के साथ-साथ उनकी सेवा,वरिष्ठता, पदोन्नति,और अन्य सेवा लाभों को पूर्ण संरक्षण प्रदान करने हेतु संसद में विधायी संशोधन अथवा विशेष प्रावधान लाकर 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को स्थायी राहत प्रदान करने की कृपा कीजिएगा। दिनेश सिंह अध्यक्ष, अनुकूल मण्डल ,कोषाध्यक्ष करूणेश जोशी , मंत्री
वरिष्ठ शिक्षक सुरेश चन्द्र उप्रेती, हृदेश चौहान, राजेन्द्र कार्की, ओमकार सिंह, विरेन्द्र तोमर,नरेश राणा,रन्जीतसिंह, प्रदीप पांडेय,विनय जायसवाल, सब्यसाची हालदार,सन्तोष नयाल,लक्ष्मी गर्ब्याल,धर्म सिंह राणा आदि शामिल रहे।





